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शब्द ॥ 98 ॥
ॐ जिंही गुरु कै खिणहीं ही ताउं , खिणहीं सीउं , खिणहीं पवणा ,
खिणहीं पाणी ,खिणहीं मेघ मंडाणो ।
कृष्ण करंता बार न होई ,थल शिर नीर निवाणो ।
भूला प्राणी विष्णु जंपो रे , ज्यूं मोत टलै जिरवाणो ।
भीगा है पर भेधा नांही ,पाणी मांह पखाणो ।
जीवत मरो रे जीवत मरो ,जिन जीवन की विध जाणी ।
जे कोई आवै हो हो करता , आप जै हुइये पाणी ।
जाकै बहुती नवणी , बहुती खवणी , बहुती क्रिया समाणी ।
जाकी तो निज निर्मल काया , जोय जोय देखो ले चढियो अस्मानी ।
यह मढ देवल मूल न जोयबा ,निज कर जंपो पिराणी ।
अन्नत रुप जोवो अभ्यागत ,तिहिं का खोज लहो सुरवाणी ।
सेतम सेतूं , जेरज जेरुं , इंडस इंडू ।
अइया लो उरध जे खेणी ॥
शब्द ॥ 99 ॥
ॐ साच सही म्हे कूड़ न कहबा नेड़ा था पण दूर न रहीबा ।
सदा सन्तोषी सत उपकरणा ।
म्हे तजिया मान भी मानूं ।
बस कर पवणा , बस कर पाणी , बस कर हाट पटण दरवाजों ।
दशे दवारे ताला जड़िया , जो एसा उसताजों ।
दशे दवारे ताला कूंची , भीतर पोल बणाई ।
जो अराधयो राव युधिषिटर ,सो अराधो रे भाई ।
जिंही गुरु के झुरे न झुरबा , खिरै न खिरणा ।
बंक त्रिबंके नाल पै नालै , नैणे नीर न झुरबा ।
बिन पुल बंधया बाणो ।
तज्या अलिंगण तोड़ी माया ,तन लोचन गुणवाणो ।
हालीलो भल पालीलो ,सिध पालीलो , खेड़त सूना राणो ॥
शब्द ॥ 100 ॥
ॐ अर्थूं गर्थूं साहण थाटूं कूड़ा दीठा ना ठाटों ।
कूड़ी माया जाल न भूली रे राजेन्द्र ,अलगी रही औजूं की बाटों ।
नव लख दंताला बार करीलो ,बार करे कर बंद करीलो ।
बंद करे कर दान करीलो ,दान करे कर मन फूलीलो ।
तंत मंत बीर बैताल करीलो खायबा खाज अखाजूं ।
निरह निरन्जन नर निरहारी ,तऊ न मिलवा ,झंझा भाग अभागूं ॥
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