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शब्द ॥ 95 ॥
ॐ वाद विवाद फिटाकर प्राणी ,छाड़ो मनह्ठ का भाणो ।
काही के मन भयो अंधेरो , काही सूर उगाणो ।
नुगरा के मन भयो अंधेरो , सूगरा सूर उगाणो ।
चरण भी रहीया लोह न झुरिया , पिंजर पड़यो पुराणो ।
बेटा बेटी बहनर भाई सब से भयो अभाणो ।
तेल लियो खल चौपै जोगी , रीता रहियो घाणो ।
हंस उड़ाणो पंथ विलंब्यो कीयो दूर पयाणो ।
आगै सुरपति लेखो मांगै , कह जीवड़ा क्या करम कमाणो ।
जिवड़ा नै पाछै सूझन लागो ,सुकृत नै पछताणो ॥
शब्द ॥ 96 ॥
ॐ सुण गुणवन्ता ,सुण बुधवंता , मेरी उत्पति आद लुहारुं ।
भाठी अंदर लोह तपीलो ,तंतक सोना घड़ै कसारुं ।
मेरी मनसा अहरण , नाद हथोड़ा ।
शशीयर शूर तपीलो , पवन अधारी खालूं ।
जे थे गुरु का शब्द मानीलो , लंघवा भव जल पारूं ।
आसन छोड़ सुखासन बैठो । जुग जुग जीव जम्भ लुहारुं ॥
शब्द ॥ 97 ॥
ॐ विष्णु विष्णु तूं भण रे प्राणी जो मन माने रे भाई ।
दिन का भूला रात न चेतया ,कांय पड़ा सूता ?
आस किसी मन थाई ।
तेरी कूड़ काची लगवाड़ घणो छै , कुशल किसी मन भाई ।
हिरदै नाम विष्णु को जंपो ,हाथ करो टवाई ।
हरि पर हरि की आण न मानी , भूला भूल जपी महमाई ।
पाहण प्रीत फिटाकर प्राणी , गुरु बिन मुक्त न जाहीं ।
पांच करोड़ी ले प्रहलाद उतरियो , जिन खरतर करी कमाई ।
सात करोड़ी ले राजा हरिश्चन्द्र उतरियो , तारादे रोहितास हरिश्चन्द हाटो हाट बिकाई ।
नव करोड़ी राव युधिष्टिर ले उतरियो ,
धन धन कुन्ती माई ।
बारह करोड़ समाहन आयो , प्रहलादा सूं कवलजूं थाई ।
किस्की नारी बस्त पियारी ,किसका बहनरूं भाई ।
भूली दुनिया मर मर जावे , न चीन्हो सुर राई ।
पाहण नाऊं लोहा सक्ता, नुगरा चीन्हत काई ॥
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