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शब्द ॥ 93 ॥
ॐ आद शब्द अनाहद बाणी , चौदह भवन रहा छल पाणी ।
जिहीं पाणी से अंड उपन्ना , उपन्ना ब्रहा ईन्द्र मुरारी ॥
शब्द ॥ 94 ॥
ॐ सहस्त्र नाम साईं भल शंभू , म्हे उपना आदि मुरारी ।
जद मैं रह्यो निरारंभ होकर , उतपति धंधुकारी ।
ना मेरै माय न बापण ,मैं अपणी काया आप संवारी ।
जुग छतीसों शुन्यहि बर्ता , सतजुग मांही बरती सारी ।
ब्रह्मा इन्द्र सकल जग थरप्या , दीन्ही करामात केतीवारी ।
चंद सूर दो साक्षी थरप्या ,पवन पवनेश्वर पवन आधारी ।
तद म्हे रुप कीयो मैनावतीयो , सत्यव्रत को ज्ञान उचारी ।
तद म्हे रुप रच्यो कामठीयों ,तेतीसों की कोड़ हंकारी ।
जद म्हे रुप धरयो वाराही , पृथ्वी दाढ चढाई सारी ।
नरसिंह रुप धर हिरण्यकश्यप मारयो ।
प्रहलादो रहियो शरण हमारी ।
बावन होय बलिराज चितायो , तीन पैंड कीवी धर सारी ।
परशुराम हो क्षत्रियपान साधयो , गर्भ न छूटो नारी ।
श्री राम सिर मुकुट बंधायो , सीता के अंहकारी ।
कन्हड़ होय कर बंसी बजाई , गउ चराई , धरती छेदी , काली नाथ्यो ,
असुर मार किया बेगारी ।
पंथ चलायो राह दिखायो , नौ बार विजय हुई हमारी ।
शेष जम्भराज आप अपरंपर , अवल दीन से कहियो ।
जाम्भा गोरख गुरु अपारा ।
काजी मुल्ला पढ़िया पंडित , निन्दा करै गंवारा ।
दो जख छोड़ भिस्त जे चाहो , तो कहिया करो हमारा ।
इन्द्र पुरी बैकुण्ठ बासो , तो पावो मोक्ष ही द्वारा ॥
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