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शब्द ॥ 90 ॥
ॐ चोईस चेड़ा कालंग केड़ा ,अधिक कलावंत आयसैं ।
बैफेर आसन मुकर होय बैसैला , नुगरा थान रचायसैं ।
जाणत भूला महापापी , बहू दुनिया भोलायसैं ।
दिल का कूड़ा कुड़ियारा, उपंग बात चलायसैं ।
गुरु गहणा जो लेवै नाहीं , दश बंध घर बोलायसैं ।
आप थापी महापापी दग्धी परलै जायसैं ।
सतगुरु कै बेड़े न चढै, गुरु स्वामी न भायसैं ।
मन्त्र बेलू ॠध सिद्ध करसै, दे दे कार चलायसैं ।
काठ का घोड़ा निरजीवता , सरजीव करायसैं ।
तानै दाल चरायसैं ।
अधर आसन मांड बैसैला ,मूवा मड़ा हंसायसैं ।
जां जां पवन आसन पाणी आसन , चंद आसन सूर आसन , गुरु आसन समराथले ।
कहै गुरु भूल मत जाईयो , पड़ौला अंभै दो जखै ॥
शब्द ॥ 91 ॥
ॐ छंदे मंदे बालक बुद्धे , कूड़े कपटे ॠध न सिधे ।
मेरे गुरु जो दीन्हीं शिक्षा, सर्व अलिंगण फेरी दीक्षा ।
जाण अजाण बहीया जब जब , सर्व अलिंगण मेटे तब तब ।
ममता हस्ती बांधया काल , काल पर काले परसत डाल ।
धयान न डोलै मन न टलै , अहनिश ब्रहम ज्ञान उच्चरै ।
काया पत नगरी मन पत राजा , पंच आत्मा परिवारूं ।
है कोई आछै मही मण्डल शूरा , मन राय सूं झूझ रचायले ।
अथगा थगायले, अबसा बसायले ।
अनबे माघ पालले ।
सत सत भाषत गुरुरायों ,जरा मरण भो भागूं ॥
शब्द ॥ 92 ॥
ॐ काया कोट पवन कुट वाली , कुकर्म कुलफ बनायो ।
माया जाल भरम का सकंल ,बहु जग रहीया छायो ।
पढ वेद कुराण कुमाया जालूं , दंत कथा जग छायो ।
सिद्ध साधक को एक मतो , जिन जीवत मुक्त दृढायो ।
जुगां जुगां को जोगी आयो , सतगुरु सिद्ध बतायो ।
सहज स्नानी केवल ज्ञानी ब्रहाज्ञानी, सुकृत अहल्यो न जाई ।
क्यों क्यों भणंता क्यों क्यों सुणता , समझ बिना कुछ सिद्धि न पाई ॥
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