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शब्द ॥ 86 ॥
ॐ जुग जागो जुग जाग पिरांणी ।
कांय जागँता सोवो ॥
भल के बीर बिगोवो होयसी दुस्मण कांय लकोवो ?
ले कुंची दरबान बुलावो ,दिल ताला दिल खोवो ।
जंपो रे जिण जंप्यो जणीयर,जपसी सो जिण हारी ।
लह लह दांव पड़ंता खेलो,सुर तेतीसां सा सारी ।
पवन बंधान काया गढ काची,नीर छलै ज्यों पारी ।
पारी बिनसै नीर ढूलैलो,औपिंड काम न कारी ।
काची काया दृढ कर सींचो,ज्यों माली सींचै बाड़ी ।
ले काया बासंदर होमो ,ज्यों ईंधन की भारी ।
शील स्नाने संजमे चालो ,पाणी देह पखालो ।
गुरु के वचने निंव खिंव चालो,हाथो जपो जप माली ।
वस्तु पियारी खरचो क्यों नांही,किंही गुण राखो टाली ?
खरचे लाहो राखे टोटो, बिबरस जोय निहाली ।
घर आगी इत गोवल वासो , कूड़ी आधोचारी ।
आज मूवा कल दूसरा दिन है,जो कुछ सरै तो सारी ।
पीछै कलीयर कागा रोलो ,रहसी कूक पुकारी ।
ताण थकै क्यों हारयो नांही,मूरखा जोलै हारी ॥
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