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शब्द ॥ 81 ॥
ॐ भल पाखण्ड़ी पाखणड मण्ड़ी ।
पहला पाप परा छत खण्ड़ा ॥
जा पाखण्ड़ी कै नादै वेदे ।
बाजत पौण ॥
ता पाखण्ड़ी नै चीन्हत कौण ।
जाकी सहजै चूकै आवा गौण ॥
शब्द ॥ 82 ॥
ॐ अलख अलख तूं अलख न लेना ।
तेरा अन्त इलोलूं ॥
कौन सी तेरी करणी पूजै ।
कौन मैं तिंहिं रूप सतूलूं ॥
शब्द ॥ 83 ॥
ॐ जो नर घोड़ै चढ़ै पाग न बांधे ।
ताकी करणी को न बिचारूं ॥
शुचियारा होयसी आन मिलसी ।
करड़ा दो जग खारूं ॥
जीव तड़ै को रिजक न मेटूं ।
मूवा परहथ सारूं ॥
हाथ न धोवे पग न पखालै नाहर सिंह नर काजूं ॥
जुग अन्नतर बरत्या म्हे सून मण्डल का राजूं ॥
शब्द ॥ 84 ॥
ॐ मूँड मुडायो मन न मूड़ायो ।
मोह अब खल दिल लोभी ॥
अन्दर दया नहीं सुर काने निंघाहड़ै कसोभी ।
गुरु छूटी टोट पड़ैला ।
उनकी आवा एक खसतो वे करणी हुँता दूँधा ॥
असी सहस नव लाख भवैला कुंभी दोरे ऊंधा ॥
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