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शब्द ॥ 74 ॥
ॐ कड़वा मीठा भोजन भखलि ।
भखकर देखत खीरूं ॥
धर आखरड़ी साथर सोवण ।
औढण ऊनां चीरुं ॥
सहजै सोवण पोह का जागणा ।
जे मन रहिवा थीरूं ॥
स्वर्गे पहेली सांभल जीवड़ा पोह उतबा तीरूं ॥
शब्द ॥ 75 ॥
ॐ जोगी रे तूं जुगत पिछांणी ।
काजी रे तूं कलम कुराणी गऊ बिणासे काहे तानी ।
राम रजा क्यौं दीन्हीं दानी ॥
कान्ह चराई रन बे बानी ।
निरगुण रूप हमें पतियानी ॥
थल सिर रह्यों आगोचर बाणी ।
ध्याय रे मुंडिया पर दानी ॥
फीटा रे अण होता तानी ।
अलाह लेखो लेसी जानी ॥
शब्द ॥ 76 ॥
ॐ तन मन धोइये संजम हुइये ।
हरष न खोइये ॥
ज्यूँ ज्यूँ दुनिया करै खुवारी ।
त्यूँ त्यूँ किरिया पुरि ॥
मुग्धा सेती यूं टल चालो ।
ज्यूँ खड़कै पात धनूरी ॥
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