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शब्द ॥ 73 ॥
ॐ हरी कंकहड़ी मँड़प मैड़ी ।
जहां हमारा बासा ॥
चार चक नव दीप थरहरै ।
जो आपो परकासूँ ॥
गुणियां म्हारा सगुणा चेलां ।
म्हे सुगणां का दासूं ॥
सुगणा होय से स्वर्गे जासैं ।
नुगरा रहा निरासूं ॥
जा का थान सुहाया घर बैकुण्ठैं ।
जाय संदेसो लायो ॥
अमियां ठमियां अमृत भोजन ।
मनसा पलंग सेंज निहाल बिछायों ॥
जागो जोवो जोत न खोवो ।
छल जासी संसारू ॥
भणी न भणवा ।
सुणी न सुणबा कही न कहवा ॥
खड़ी न खड़वा ।
रे भल कृषाणी ।
ताकै करण न घातो हेला ।
कलिकाल जुग बर्तै जैलो ।
तातै नाहीं सुरां सो मेलो ।
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