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शब्द ॥ 69 ॥

ॐ जबरारे तो जग डांडीलो ।

देह न जींतो जाणो ॥


माया जाले ले जम काले ।

लैणा कोण समाणो ॥


काचै पिण्डे किसी बड़ाई ।

भोले भूल अयाणो ॥


म्हा देखता देव दाणूं ।

सुर नर खीणा ॥


बीच गया बे राणो ।

कुम्भकर्ण महारावण होता ॥


अबली जोध अयाणो ।

कोट लंका गढ विषमा होता ॥


कादा बस गया रावण राणो ।

नोग्रह रावण पाप बन्धा ॥


तिस बीह सुरनर शंक भयाणो ।

ले जम काले अति बुध वँतो ॥


सीता काज लुभाणो ।

भरमी बादी अति अंहकारी ॥


करता गरब गुमानों ।

तेऊ ते जम काला खीणां ॥


थिर न लादो थाणो ।

काचै पिण्ड अकाज अफारुं ॥


किसो प्राणी माणो ।

साबणा लाख मजीठी बिगुता ॥


थोथा बाजर घाणों ।

दुनिया राचे गाजै बाजै ॥


तामे कूण न दाणूं ।

दुनिया के रंग सब कोई राचै ॥


दीन रचै सो जाणे ।

मागर मणियां काच कथीर न राचो ॥


कूणा दुनी डफाणो ।

चलण चलन्ते ॥


जीव जीवन्तै ।

काया नवन्तै ॥


सास फुरन्तै ।

कायरे प्राणी विष्णु न जंप्यो ॥


कीयो कांधै को ताणो ।

तिहिं उपर आवेला जबर तणा दल ॥


तास किसो सहनाणो ।

ताकै सीस न औढगा ॥


पायन पहरणा ।

नैवा झुल झयाणो ॥


धड़क न बाण न टोप अड़गा ।

टाटर चुगल चयाणो ॥


सास सुचँगी घृतसुबासो ।

पीवण न ठंडा पाणी ॥


सेज न सोवण ।

पलंग न पौढण ॥


छात न मैड़ी माणो ।


न व दइया ॥


न व मइया ।

नागड़ दुत भयाणो ॥


काचा तोड़ निकूचा भाषै ।

अघट घटैं मल माणो ॥


धरती और असमान अगौचर ।

जाते जीव न देही जाणो ॥


आवत जावत दीसे नांही ।

साचर जाय अयाणो ॥


आयसां जोयसां भणतां गुणंता ।

बार महुर्ता पोथो थौथा ॥


पुस्तक पढिया वेद पुराणों । भूत प्रेती कांय जपीजै यह पाखण्ड परमाणो ।

कान्ह दिशावर जेकर चालो ॥


रतन काया ले पार पहुंचो ।

रहसी आवा जाणो ॥


ताह परेरे पार गिरायै ।

तत कै निश्चल थाणो ॥


सो अपरं पर कांय न जंपो ।

तत खहौ लौह ईमाणो ॥


भल भुल सींचो रे प्राणी ।

ज्यूं तरवर मेलत डालूं ॥


जइया मूल न सींचो ।

तो जामण मरण बिगोबो ॥


अहनिष करणी थिर न रहिबा । न बंच्यो जम कालूं कोई कोई भल मूल सींची लो ।

भलतत्व बुझी लो ॥


जा जीवन की बिध न जाणी ।

जीव तड़ा कुछ लाहो होयसी ॥


मुवा न आवत हांणी ॥





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