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शब्द ॥ 65 ॥

ॐ तउवा जाग जो गोरख जाया ।

निरह निरह निरालम्ब ॥


जुग छतीस एकै आसन बैठा बरत्या ।

और भी अबधू जागत जागूं ॥


तउवा त्यागज ब्रह्म त्यागा ।

और भी त्यागत त्यागूं ॥


तउवा भाग जो ईश्वर मस्तक ।

और भी मस्तक भागूं ॥


तउवा सीर जो ईश्वर गौरी ।

और भी कहियत सीरूं ॥


तउवा बीर जो राम लक्ष्मण और भी कहियत बीरूं ।

तउवा पाग जो दशशिर बांधी ॥

और भी बांधत पागो ।

तउवा लाज जो सीता लाजी॥


और भी लाजत लाजूं ।

तउवा बाजा राम बजाया ॥


और भी बजावत बाजूं ।

तउवा पाज जो सीता कारण लक्ष्मण बांधी ॥

और भी बांधत पाजूं । तउवा काज जो हनुमत सारा और भी सारत काजूं ।

तउवा खागज जि कुम्भकर्ण महारावन खाज्या ॥


और भी खावत खागूं ।

तउवा राज दुर्योधन माणया ॥


और भी माणत राजूं ।

तउवा रागज कन्हड़ बाणी ॥

और भी कहिये रागूं ।

तउवा माघ तुरगम तेजी ॥


तटूतणा भी माघूं ।

तउवा बागज हँसा टोली ॥


बुगला तोली भी बागूं ।

तउवा नाग उधावल कहिये ॥


गरूड़ सीया भी नागूं ।

जां जां शैतानी करै उफारूँ ॥


तां तां महंत जफलीयो ।

जुरा जम राक्षस जुरा जुरिन्द्र ॥

कंश केशी चंडरू ।

मधु कीचक हिरणाक्ष हिरणाकुस ॥


चक्रधर बलदेऊ ।

पाबत वासुदेवों ॥


मणडलीक कांयन जोयबा ।

इंहधर उपर रतीन रहीबा राजूं ॥





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