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शब्द ॥ 64 ॥
ॐ मैं कल भूला माँड पिराणी ।
काँचै कंध अगाजूं ॥
काचा कंध गले गल जायसैं ।
बीखर जैला राजों ॥
गड़ बड़ गाजा कांय बिवाजा ।
कण बिण कूकस कांय लैणा ॥
कांय बोलो मुख ताजों ।
भरमी बादी अति अंहकारी ॥
लावत यारी ।
पशुवां पड़े भरान्ति ॥
जीव बिणासे लाहे करणै ।
लोभ सवारथ खायबां खाज अखाजों ॥
जो अति काले ले जम काले तेपण खीणा ।
जिंही का लंक गढ था राजों ॥
बिन हस्ती पाखर बिन गज गुड़ियों ।
बिन ढोला डूमा लाकड़ियो ।
जाके परसण बाजा बाजै ॥
सो अपर पर कायन जंप्यो हिन्दु मुस्लमानो ।
डर डर जीव के काजै ॥
राव रंका राजा रावां ।
रावत राजा ॥
खाना खोजां ।
मीरां मुल्लकां गढ फकीरां ॥
घड़ा गुरवाँ ।
सुर नर देवां ॥
तिमर लूं लड़घा ।
आयसां जोयसां ॥
साह पुरोहितां ।
मिश्र ही व्यासों रुखां बिरखां ॥
आव घटंती ।
अतरा माहे कुण बिशेषो ।
मरणत एको माघो ॥
पशु मुकेरूं लहेन फेरुँ ।
कहे जमेरुं सब जग कैरूं ॥
साचै से हर करै घणैरूं ।
रिण छाणै जूं बीखर जैलां ॥
तातैं मेरूं न तेरूं ।
विसर गया ते माघूं ॥
रक्तूं नातूं सेतूं धातूं ॥
कुमलावे ज्यौं सागु जीवर पिंड बिछोबा होयसी ॥
तादिन दाम दूगाणी ।
आढण पैं कीरती बिसोवो सीझे नांही ॥
औपिंड काम न काजूं ।
आवत काया ले आयो थो ।
जांते सुको जागो ॥
आवत खिण एक लाइ थी ।
पर जाते खिण एक न लागे ॥
भाग प्रापति कर्मां रेखां ।
दरगै जबला जबला माघों ।
बिरखे पान झड़ै झड़ै जायला ।
ते पर लइ न लागूं ॥
सेतूं दुगधूं कवलज कलियों ।
कुमलावे जयूं सागूं ॥
ॠतु बसंती आई ।
और भलेरा सागूं ॥
भूला तेण गयारे प्राणी ।
तिंहिं का खोज न माघूं ॥
विष्णु विष्णु भण लोई न सोई ।
सुर नर ब्रह्म को न गाई ॥
तातैं जबर बिनड़रेसी भाई ।
बास बसंतै की वी न कमाई ॥
जबर जणा जमदूत दुहैला ।
तातै तेरी कहा न बसाई ॥
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