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शब्द ॥ 63 ॥

ॐ आतर पातर राही रुक्मन ।

मेल्हा मँदिर भोयों ॥


गढ़ सोवनाते पण्मेल्हा ।

रहा छड़ासी जोयों ॥


रात पड़ंता पाला भी जाग्या ।

दिवस तपँता सुरूं ॥


ऊन्हा ठाडा पवनाभी जाग्या ।

के के नुगरां देता गाल गहीरूं ॥


जिंहिं तन ऊंना ओढण औढां ।

तिंहि औढता चीरूँ ॥


जा हाथे जप माली जपां ।

तहाँ जपताँ हीरूं ॥


बारा काजै पड़ो बिछोहो ।

संभल संभल झुरूं ॥


राघो सीता हनवंत पाखो ।

कोन बंधावत धीरूं ॥


मागर मणिया काच कथीरूं ।

हीरस हीरा हीरूं ॥


बिषा पटँतर पड़ता आया ।

पूरस पुरां पूरूं ॥


जे रिण राहे सूर गहीजै ।

तो सूरस सूरां सुरूं ॥


दुषिया है जे सुषिया होयसी ।

करसै राज गहीरूं ॥


महा अंगीठी बिरषा औल्हौ ।

जेठ न ठण्डा नीरूं ॥


पलंग न पोढण ।

सेज न सोवण ॥


कण्ठ रुलंता हीरूं ।

इतना मोह न मानै शंभू ॥


तहीं तहीं सु सीरुं ।

घोड़ा चोली बाल गुदाई ॥


श्रीराम का भाई ।

गुरु की बाचा बहियों ॥


राघो सीता हनवत पाखो ।

दुख सुख कांसु कहियों ॥





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