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शब्द ॥ 5 ॥
ओ३म् अइया लो अपरंपर बांणी। म्हे जपां न जाया जीऊं॥
नवअवतार नमोनारायण। तेपण रूप हमारा थीयूं॥
जती तपी तक पीर ऋषेश्वर। कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं॥
खेचर भूचर खेत्रपाला परगट गुप्ता। कांय जपीजे तेपण जाया जीऊं॥
वासग शेष गुणिंदा फुणिंदा। कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं॥
चौषट जोगनि बावन बीरूं। कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं।
जपां तो एक निरालंभ शिंभु। जिहिं कै माई न पीऊं॥
न तन रक्तूँ न तन धातूँ। न तन ताव न सीऊं॥
सर्व सिरजत मरत बिवरजत। तासन मूलज लेणा कीयों॥
अइयालों अपरंपर बाणी। म्हे जपां न जाया जीऊं॥५॥
शब्द ॥ 6 ॥
ओ३म् भवन भवन म्हे एकाजोती। चुन-चुन लीया रतना मोती॥
म्हे खोजी थापण होजी नाहीं। खोज लहां धुर खोजूँ॥
अल्लाह अलेख अडाल अजोनि स्वयंभू। जिहिं का किसा बिनाणी॥
म्हे सरैन बैठा सीख न पूछी। निरत सुरत सब जाणी॥
उतपति हिंदू जरणा जोगी। किरिया ब्राह्मया दिल दरबेसां उन मुन मुल्ला अकल
मिसलमानी॥६॥
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