|
|
शब्द ॥ 53 ॥
ॐ गुरु हीरा बिणजै ले हम लेहूँ ।
गुरु न दोष न देणा ॥
पवणा पाणी जमी मेहुँ ।
भार अठारै परबत रेहूँ ॥
सूर्ज जोती परै परे रै ।
ऐती गुरु कै शरणै ॥
केती पवली अरूं जल बिम्बा ।
नवसै नदी नवासी नाला सायर अति जरणा ॥
कौढ निनाणवें राजा भोगी ।
गुरु के आखर कारण जोगी ।
माया राणी राज ताजीलो ।
गुर भेटीलों जोग सझीलो ॥
पिंडा देख न झुरणा ।
कर कृषाणी बेफायत सेंठों जोय जोय जीव पिंडै निसरणा ।
आदैं पहलू घडी अढाई ।
स्वर्गे पहूंता हिरणी हिरणा ॥
सुरां पुनां तेतीसाँ मेलो ।
जे जीवँता मरणे ॥
के के जीव कुजीव ।
कुधात कलोतर बाणी ॥
वादी लो हँकारीलो ।
वैभाल घणाले मरणैँ ॥
मनषारे तैं सूतै सोयो खुलै खोयो ।
जड़ पाहन संसार विगोयो ॥
निरफल खोड़ भिरांति भूला ।
आस किसी जा मरणे ॥
बैसाइ अंध पड़ यो फंद ।
लियो गलबंध गुरु बरजते ॥
हेलै स्याम सुन्दर के टोडैं ।
पारस दुस्तर तरणौ निश्चे छैह पड़ैलो पालो ।
गौवल बास कमायले जिवड़ा ।
सो स्वर्गापुर लहणे ॥
केती पवली अरू जल बिम्बा ।
नवसै नदी नवासी नाला सायर एति जरणा ॥
कौड़ निनाणवै राजा भोगी ।
गुरु कैं आखर कारण जोगी ।
माया राणी राज तजीलो ।
गुरु भेटिलो जोग सझीलो ॥
पिंडा देख न झुरणा ।
कर कृषाणी बेफायत सेंठो जोय जोय पि
|