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शब्द ॥4॥

ओ३म्‌ जद पवन न होता पाणी न होता।

न होता धर गैणारूं॥

चंद न होता सुर न होता। न होता गिंग दर तारुं॥

गऊ न गोरू माया जाल न होता न हेत पियारूं॥

माय न बाप न बहण न भाई साखन सैंण न होता।

न होता पख परवारू॥

लख चौरासी जीया जूणी न होती।

न होती बणीं अठारा भारूं॥

सप्त पताल फुँणीद न होता। न होता सागर खारुं।

अजिया सजिया जीया जूणी न होती। न होती बणीं अठारा भायं॥

सप्त पताल फुँणीद न होता।

न होता सागर खारूं॥

अजिया सजिया जीया जूणी न होती।

न होती कुड़ी भरतारूं॥

अर्थ न गर्थ न गर्व न होता।

न होता तेजीतुरंग तुखारूं॥

हाट पटण बाजार न होता। न होता।

न होता सागर खारूं॥

अजिया सजिया जीया जूणी न होती।

न होती कुड़ी भरतारूं॥

अर्थ न गर्थ न गर्व न होता।

न होता तेजीतुरंग तुखारूं॥

हाट पटण बाजार न होता।

न होता राज दवारूं॥

चाव न चहन न कोह का बांण न होता।

तद होता एक निरंजण शिंभू, कै होता धंधू कारूं॥

बाद कदो की पूछै लोई। जुग छत्तीस बिचारूं॥

ताह परैरे अवर छत्तीसूं।

पहला अंत न पारूं॥

म्हे तदपण होता अब पण आछै, बल २ होयसां कह कद कद का करूं विचारूं ॥४॥





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