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शब्द ॥ 47 ॥

ॐ काया कँथा मन जो गूंटो ।

सींगी श्वाँस उश्वासूं ॥


मन मृग राखले कृषाणी ।

यौं म्हे भया उदासों ॥


हम ही जोगी हम ही जती ।

हम ही सती ।

हम ही राखवां चितूं ।

पांच पटण नव थानक साधले आदि नाथ का भक्तूं ॥




शब्द ॥ 48 ॥

ॐ लक्ष्मण लक्ष्मण न कर आयसां ।

म्हारे साधां पड़ै बिराऊं ॥


लक्ष्मण सो जिन लंका लीवी रावण मारयो ।

ऐसो कियो संग्रामों ॥


लक्ष्मण तीन भवन को राजा ।

तेरे ऐक न गाऊं ॥

लक्ष्मण कै तो लख चौरासी जीया जूणी ।

तेरे एक न जीऊं ॥


लक्ष्मण तो गुणवंतो जोगी ।

तेरे बाद बिराऊं ॥

लक्ष्मण का तो लक्षण नांही ।

शीश किस बिध नाऊं ॥





शब्द ॥ 49 ॥

ॐ अवधू अजरा जार ले ।

अमरा राखले ॥


राखले बिन्द की धारणा ।

पाताल का पाणी आकाश कू चढ़ाय ले ॥


भेट ले गुरु का दरशणो ।



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