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शब्द ॥ 44 ॥
ॐ खर तर झोली खर तर कँथा ।
कांध सहै दु:ख भारूं ॥
जोग तणी थे खबर न पाई ।
काँय तज्या घर बारुं ॥
ले सुई धागा सींवण लागा ।
जड़ जटा धारी न लंघै पारी ।
बाद बिवादी बेकरणो ॥
थे बीर जपो बैताल ध्यावो ।
कांय न खोजो तत्व कणो ॥
आयसां डंडत डंडू मुंडत मुंडू ।
मुंडत माया मोह किसो ॥
भरमी बादी बादे भूला ।
कांय न पाली जीव दयों ॥
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