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शब्द ॥ 42 ॥

ॐ आयसाँ काहै काजै खैह भकरूड़ो ।

सेवो भूत मसांणी ॥


घड़े ऊधै बरसत बहु मेहा ।

तिंहिंमा कृष्ण चरित बिन ॥


पड़यो न पड़सी पाणी ।

जोगी जंगम ,नाथ ,दिगम्बर ।

संन्यासी, ब्राह्मण, ब्रह्मचारी ॥


मनह्ठ पढिया पणिडत ।

काजी ,मुल्ला ,खेलै आप दुवारी ॥


निश्चै कायौं बायौं होयसी ।

जै गुरु बिन खेल पसारी ॥




शब्द ॥ 43 ॥

ॐ ज्यौं राज गए राजेन्दर झुरै ।

खोज गए न खोजी ॥


लाछ मुई गिरहायत झुरै ।

अर्थ बिहूँणा लोगी ॥


मौर झड़ै कृषाण भी झुरै ।

बिन्द गए न जोगी ॥


जोगी जंगम जपिया तपिया ।

जती तपी तक पीरूं ॥


जिंहिं तुल भूला पाहण तोलै ।

तिंहिं तुल तोलन हीरूं ॥


जोगी सो तो जुग जुग जोगी ।

अब भी जोगी सोई ॥


थे कान चिरावो चिरघट पहरो ।

आयसा यह पाखंड तो जोग न होई ॥


जटा बधारो जीव सँघारो ऐसा यह पाखण्ड तो जोग न कोई ॥



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