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शब्द ॥ 34 ॥
ॐ फुरण फुहारै कृष्णी माया ।
घण बरसंता सरवर नीरे ॥
तिरी निरन्ते जे तिस मरे तो मरियों अत्रों धत्रों दूधूं दहियों ॥
घीऊं मेऊं टेऊं जे लाभन्ता ।
भूख मरे तो जीवन ही बिन सरियो ॥
खेत मुक्त ले कृष्णा अर्थो ।
जे कन्ध हरे तो हरियो ॥
विष्णु जपन्ता जीभु जे थाकै ।
तो जीभड़ीया बीन सरियो ॥
हरि हरि करता हरकत आवे तो ना पछतावो करियों ।
भीखी लो भीखीयारी लो ॥
जै आद परम तत्व लाधो ।
जाके बाद बिराम बिरासो सासों ॥
तानै कौन कहसी सालिया साधौ ॥
शब्द ॥ 35 ॥
ॐ बल बल भणत व्यासूँ ।
नाना अगम न आसूं ॥
नाना उदक उदासूं ।
बल बल भई निराशूं ॥
गल में पड़ी परासूं ।
जां जां गुरु न चीन्हौ तइया सीचा न मूलूं कोई कोई बोलत थूलूं ।।
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