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शब्द ॥ 32 ॥
ॐ कोत गऊ जे तीर्थ दानों ।
पांच लाख तुरगम दानों ॥
कण कंञ्चन पात पटंबर दानों ।
गज गेवर हस्ती अति बल दानों ॥
करण दधीच सिंवर बल राजा ।
श्रीराम ज्यौं बहुत करै आचरूं ॥
जां जां बाद बिबादि अति अहंकारी लुब्द सवादी ।
कृष्ण चरित बिन नांहि उतरिबा पारूं ॥ 32॥
शब्द ॥ 33 ॥
ॐ कवण न हुआ कवण न होयसी किण न सह्यो दु:ख भारूं ॥
कवण न गया कवण न जासी ।
कवण रहा संसारूं ॥
अनेक अनेक चलंता दीठा ।
कलिका माणस कौण विचारूं ॥
जो चित होता सो चित नांही ।
भल खोटा संसारूं ॥
किस का माई किसका भाई ।
किस का पख परवारूं ॥
भूली दुनिया मर मर जावै ।
न चीन्हौ करतारूं ॥
विष्णु विष्णु तुं भण रे प्राणी ।
बल बल बारम्बारूं ॥
कसणी कसवा भूल न बहवा ।
भाग परापति सारूं ॥
गीता नाद कविता नाउं ।
रंग फटारस टारूं ॥
फोकट प्राणी भर में भुला ।
भलजे यौं चीन्हौं करतारूं ॥
जामण मरण बिगोवो चुकै ।
रतन काया लै पार पहुचै तो आवागवण निवारुं
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