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शब्द ॥ 31 ॥
ॐ भल मूल सींचो रे प्राणी ज्यौं का भल बुद्धि पावे ॥
जामन मरण भव काल जू चूकै ।
तो आवागवण न आवे ॥
भल मूल सींचो रे प्राणी ।
ज्यौं तरवर मेलत डालूं ॥
हरि पर हरि की आव न मानी ।
झख्या भूलां आलूं ॥
देवा सेवा टेव न जांणी ।
नं बँच्या जम कालूं ॥
भूलै प्राणी विष्णु न जंप्यौ मूलन खोज्यो ।
फिर फिर जोया डालूं ॥
बिन रैणायर हीरै नीरै ।
नगन सीपे तके न खोला नालूं ॥
चलन चलन्ते बास बसन्ते जीव जीवन्ते काया नवन्ते ।
काँयरे प्राणी विष्णु न घाती भालूं ॥
घड़ी घटंतर पहर पटंतर ।
रात दिनंतर ॥
मास पखंतर ।
क्षिण औल्हर हवा कालूं ॥
मीठा झूंठा मोह बिटंबण ।
मरक समाया जालूं ॥
कबही को बाइंदो बाजत लौई ।
घड़िया मस्तक तालूं ॥
जीवां जौणी पड़ै फासा ।
ज्यौं झींवर मछी मच्छा जालूं ॥
पहलै जीवड़ो चैतो नांही ।
अब उंडी पड़ी पहारूं ॥
जीवर पिंड बिछोड़ो होयसी।
तादिन थाक रहै शिर मारूं ॥
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