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शब्द ॥ 29 ॥

ॐ गुरु के शब्द असंख्य प्रबोधी ।

खार समन्द परीलो ॥


खार समन्दर परे परेरै ।

चौखणड खारूं पहिला अन्त न पारूं ॥


अनन्त कोड़ गुरु की दावण बिलंबी |

करणी साचतरिला ॥


साँझैजमों सवैरैं थापण |

गुरु की नाथ डरीलो ॥


भगवी टोपी थलसिर आयो |

हेत मिलाण करीलो ॥


अम्बाराय बधाई बाजे |

हृदय हरि सिमिरिलो ॥


कृष्ण मया चौखण्ड कृषांणी |

जम्बूदीपे चरीलो ।


जम्बूदीप ऐसो चर आयो |

ईसकंदर चेतायो ॥


मान्यो शील हकीकत जाग्यो |

हक की रोजी धायों ॥


ऊंनथ नाथ कुपह को पोहमा आणयां |

पोह का धुर पहुंचायों ॥


मोरे धरती ध्यान, बनस्पति बासो |


औजू मण्डल छायों ।

गेंदू मेर पगाणे पर्बत ॥


औजू मण्डल छायों ।

गेंदू मेर पगाणे पर्बत ॥


मन्सा सोड़ तुलायों ।

ऐ जुग चार छतीसां और छतीसां ॥


आश्रा बहै आंधारी ।

म्हे तो खड़ा बिहयों ॥


तेतीसां की बरग बहाम्हे |

बारां काजे आयो ॥


बारां थाप घणां न ठाहर मतां तो डीले डीले कौड़ रचायो ॥


म्हे ऊंचे मण्डल का रायो |

समंद बिरोल्यो बासग नेतो ॥


मेर मथाणी थायों ।

सँसा अर्जुन मारयो ॥


कारज सारयो ।

ज्द म्हे रहस दमामा बायों ॥


फेरी सीत लई जद लंका ।

तद म्हे ऊथे थायों ॥

दह सिर का दस मस्तक छेदा ।

बाण भला निर तायों ॥


म्हे खोजी था पण होजी नां ही ।

लह लह खेलत डायों ॥


कंसा सुर सो जुवै रमिया ।

सहजे नन्द हरायो ॥

कुंत कुंवारी कर्ण समानो |

तिंहिं का पोह पोह पड़दा छायों ॥


पाहे लाख मजीठी पाखो |

बन फल राता पीझूं पाणीके रंग धायों ॥


तेपण चाख न चाख्या |

भाखन भाख्या ॥


जोय जोय लियो फल केर रसयों ॥


थे जोग न जोग्या भोग न भोग्या न चीन्हो सुर रायों ॥


कण बिन कूकस कांये पीसो |

निश्चे सरी न कायों ॥


म्हे अबधू निर पख जोगी |

सहज नगर का रायों ॥


जो ज्यौं आवे सौ त्यूं थरपां |

साचासौं सत भायों ॥

मौरे मन ही मुद्रा तन ही कंथा |

जोग मारग सह लीयों ॥


सात सायर म्हे कुरलैं कीयों |

ना म्हे पिया न रहयो तिसायों ॥


डाकण साकण निद्रा खुदया |

ये म्हारे तांबे कूप छिपायों ॥


म्हारे मन ही मुद्रा तन ही कंथा |

जोग मार्ग सह लियों ॥


डाकण साकण निद्रा खुदया|

ये मेरै मूल न थीयों ॥



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