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शब्द ॥ 27 ॥
ॐ पढ कागल वेदूं शास्त्र शब्दूं ।
पढ सुन रहिया कछु न लहिया ॥
नुगरा उमग्या काठ पषाणों कागल पोथा ना कुछ थोथा ।
ना कुछ गाया गिउं ।
किण दिस आवे किण दिस जावै ।
माय लखै ना पीऊं ।
ईंडे मध्ये पिंड उपना ॥
पिंडे मध्ये बिंब उपना ।
किण दिश पैठा जींऊं ॥
ईँडे मध्य जीव उपना ।
सुणरे काजी सुणरे मुल्ला ।
पीर ॠषीश्वर रेमस बासी तीर्थ वासी किण घट पैठा जीऊं ॥
कंसा शब्दे कंस लुकाई ।
बाहर गई न रीऊं ॥
क्षिण आवै क्षिण बाहर जावे ।
रुत कर बरसत सीउं ॥
सोवन लंक मंदोदर काजै ।
जोय जोय भेद विभीषण दियो ॥
तेल लियो खल चौपे जोगी ।
तिंहिंका मोल थोड़ेरो कीयो ॥
ज्ञाने ध्याने नादे वेदे जे नर लेणा ।
तत भी तांही लियो ।
करण दधीच सिंबर बल राजा ।
हूई का फल लियों ॥
तारादे रोहितास हरिचँद ।
काया दसबन्ध दीयों ॥
विष्णु अजंप्या जन्म अकारथ ।
आंके डोडा खींपे फलीयों ॥
काफर बिबरजत रहियूं ।
सेतू भाँतू बहू रंग लेणा ॥
सब रंग लेणा रहियूं ।
नाना रे बहु रंग न राचै काली ऊन कुजीऊं ॥
पाहे लाख मजीठी राता ।
मूल न जिंहिं का रहियूं ॥
कब ही वह गृह ऊथरी आवै ।
शैतानी साथै लीयौं ॥
ठोठ गुरु वृष लि पति नारी ।
जद बँकै जद बीरूं ॥
अमृत का फल ऐक मन रहिबा ।
मेवा मिष्ट सुभायों ॥
अशुद्ध पुरुष वृष ली पति नारी ।
बिन परचै पार गिराय न जाई ॥
देखत अन्धा सुणता बहरा ।
तासौ कछु न बसाई ॥
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