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शब्द ॥ 23 ॥

ॐ साल्हिया हुआ मरण भय भागा ।

गाफल मरणें घणा डरे ॥


सत गुरु मिलियो सतपथ बतायो । भ्रांत चुकाई ।

मरणे बहु उपकार करे ॥


रतन काया सोभंति लाभै ।

पार गिराये जीव तिरै ।


पार गिराये सनेही करनी ।

जंपौ विष्णु न दोय दिल करणी ॥


जंपौ विष्णु न निन्दा करणी ।

मांडो कांध विष्णु के शरणे ॥


अतरा बोल करो जे साचा ।


तो पार गिरन्य गुरु की बाचा ॥

रवणा ठ्वणा चवरा भवणा ।

ताहि परे रै रतन काया छै ॥


लाभै किसे बिचारी ।

जे नवी थे नवणी ॥


खवीये खवणी, जरिये जरणी ।

करिये करणी ॥


तो सीख हुआ घर जाइये ।

रतन काया साँचे की ढ़ोली ॥


गुरु परसादे केवल ज्ञाने। धर्म अचारे । शीलै संजमे ।


सत गुरु तूठे पाइये ॥23॥




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