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शब्द ॥ 17 ॥
ओ३म् मोरै सहजै सुन्दर लोतर बाणी। ऐसा भयो मन ज्ञानी॥
तइया सासूं। तइया मासूं। रक्तूं रहीयूं॥
खीरू नीरू। ज्यूं कर देखूं। ज्ञान अदेसूं। भूला प्राणी कहै सो करणे॥
अइ अमाणो। तत समाणो। अइया लो महे पुरूषन लेणा नारी।
सो दत सागर सो सुभ्यागत। भवन भवन भिखियारी॥
भीखीं लो भिखियारी लो। जे आदि परमतंत लाधे॥
जाकै बाद बिराम बिरासो सांसो। तानै कौन कहसी साल्हिया साधु॥१७॥
शब्द ॥ 18 ॥
ओ३म् जांकुछ जांकुछ जां कछू न जांणी। नाकुछ नाकुछ तां कुछ जांणी॥
नाकुछ नाकुछ अकथ कहाणी। नाकुछ नाकुछ अमृत बाणी।
ज्ञानी सोतो ज्ञानी रोवत। पढ़िया रोवत गाहे॥
केल करन्ता मोरी मोरा रोवत। जोय जोय पगां दिखाही।
उरध खैणी मन उनमन रोवत। मुरखा रोवत धाहीं॥
मरणत माघ संघारत खेती। के के अवतारी रोवत राही॥
जड़िया बूंटी जे जग जीवै। तो वैदा क्यूं मर जाही॥
खोज पिरांणी ऐसा बिनाणी। नुगरा खोजत नाहीं॥
जां कुछ होता ना कुछ होयसी। बल कुछ होयसी ताहीं॥१८॥
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