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शब्द ॥ 116 ॥
ॐ आयसां मृगछाला पावड़ी कांय फिरावो ,
मतूंत आयसां उगंतो थाण थभाऊं ।
दोनो पर्बत मेर उजागर ,मृतूंत अधबिच आन भिड़ाऊं ।
तीन भवन की राही रुक्मण ,मतूंत थलसिर आण बसाऊं ।
नवसै नदी नवासी नाला ,मतूंत थलसिर आण बसाऊं ।
सीत बहोड़ी लंका तोड़ी ,ऐसो कियो संग्रामो ।
जा बाणै म्हे रावण मारयो ,मतूंत आयसां गढ हस्थनापुर सै आण दिखाऊं ।
जो तूं सोने की मृगी कर चलावै ,मतूंत घण पाहण बरसाऊं ।
मृगछाला पावोड़ी कांय फिरावो , मतूंत उगंतो थाण थंभाऊं ॥
शब्द ॥ 117 ॥
ॐ टूका पाया मगर मचाया, ज्यूं हंडिया का कुता ।
जोग जुगत की सार न जाणी ,मूड़ मूंडाया बिगूता ।
चेला गुरु अपरचै खीणा ,मरते मोक्ष न पायो ॥
शब्द ॥ 118 ॥
ॐ स्वर्गा हूंते शंभू आयो ,कहो कौन के काजै ।
नर निरहारी एक लवाई ,प्रगट जोत बिराजै ?
प्रहलादां सूं बाचा कीवी ,आयो बारा काजै ।
बारां में से एक घटे तो सूचेलो गुरु लाजै ॥
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