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शब्द ॥ 114 ॥
ॐ सुर नर तणो सन्देसो आयो ,सांभलियो रे जाटो ।
चांदनै थाकै अंधेरै क्यों चालो , भूल गया गुरु बाटो ।
नीर थकै घट थूल क्यों राखो , सबल बिगोवो खाटो ।
मागर मणियां क्यों हाथ बिसोहो ,कांय हीरा हाथ उसाटो ।
सुर नर तणो सन्देसो आयो ,सांभलियो रे जाटो ॥
शब्द ॥ 115 ॥
ॐ म्हे आप गरीबी तन गुदड़ियो ,मेरा कारण किरिया देखो ।
बिन्दो ब्योहरो ब्योर बिचारो, भूलस नांही लेखो ।
नदिये नीरूं ,सागर हीरूं ।
पवणा रूप फिरै परमेश्वर , बिम्बै बेला निश्चल थाघ अथाघूं ।
उमग्या समाघूं ते सरवर कित नीरूं ।
गहर गम्भीरूं ।
खिण एक सिन्ध पुरी विश्राम लियों ।
अबजूं मण्डल भई अवाजूं ,म्हे शून्य मण्डल का राजूं ॥
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