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शब्द ॥ 110 ॥
ॐ मथुरा नगर की रानी होती , होती पाटम दे राणी ।
तीरथ वासी जाती लूटे ,अति लूटे खुरसाणी ।
माणक मोती हीरा लूटा ,जाय बिलूधा दाणी ।
कवले चुके बचने हारी , जिंहिं अवगुण ढांची ढोवे पाणी ।
विष्णु को दोष किसो रे प्राणी ,आपे खता कमाणी ॥
शब्द ॥ 111 ॥
ॐ खरड़ औढीजै ,तूम्बा जीमीजै ,सुरह दुहीजै ।
कृत खेत की सींव मलीजै ,पीजै ऊढां नीरूं ।
सुर नर देवा बंदी खानै ,तित उतरिया तीरुं ।
भोलब भालब ,टोलम टालम ,ज्यों जाणो त्यूं आणो ।
मैं बाचादाई प्रहलादा सूं ,सो चेलो गुरु लाजै ।
क्रोड़ तेतीसूं बाड़ै दीन्हीं ,जिनकी जात पिछाणो ॥
शब्द ॥ 112 ॥
ॐ जके पंथ का भांजणा ,गुरु का नींदणा ,स्वामी का दुस्मणा ।
कुफर ते काफरा ,कुमली कूपातूं ,कुचिला कुधातूं ।
हड़ हड़ा ,भड़ भड़ा ,दानबे दूतबा ,दानबे भूतबा ,राकसा बोकसा ।
जाका जन्म नहीं पर कर्म चण्डालूं ।
और कूं जीभैं कर आप कूं पोषणा ।
जिंहि की रुवाह ले दीजैसी ।
दौरे धूंप अधारूं।
तानबे तानबा ,छानबे छानबा ,तोड़बे तोड़बा , कूकबे पुकारबा , जाकी कोई न करबा सारूं ॥
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