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शब्द ॥ 107 ॥

ॐ सहजे शीले सेज बिछायो ,उनमन रहा उदासूं ।

जुगै जुगन्तर ,भवे भवन्तर कहूं कहाणी कासूं ।

रवि उल्लू जब उल्लू अन्धा ,दुनिया भया उजासूं ।

सतगुरु मिलियो सतपंथ बतायो , भ्रान्त चुकाई ,सुगरा भयो बिसवासूं ।

जां जां जाण्यो तहां प्रमाणो ,सहज समाणो ,जिंहि के मन की पूगी आसूं ।

जहां गुरु न चीन्हों पंथ न पायो ,तहां गल पड़ी परासूं ॥




शब्द ॥ 108 ॥

ॐ हालीलो भल पालीलो ,सीध पालीलो ,खेड़त सूना राणो ।

चन्द्र सूर दोय , बैल रचीलो , गंग जमन दोय रासी ।

सत संतोष दोय बीज बीजीलो ,खेती खड़ी आकाशी ।

चेतन रावल पहरे बैठे , मृगा खेती चर नहीं जाई ।

गुरु प्रसादे केवल ज्ञाने ,ब्रह्मा ज्ञाने ,सहज स्नाने ,यह घर ॠध सिद्ध पाई ॥


शब्द ॥ 109 ॥

ॐ देखत भूली को मन माने ,सेवै बेलोवै बाज सिनाने ।

देखत भूली को मन चेवै ,भीतर कोरा बाहर भेवै ।

देखत भूली को मन मानै ,हरि पर हरि मिलियो शैताने ।

देखत भूली को मन चेवै ,आक बखाणै थदे मेवै ।

भूला लो भल भूला लो भूला भूल न भूलो ।

जिंहिं ठूठड़िये पान न होता ते क्यों चाहत फूलूं ॥



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