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शब्द ॥ 104 ॥
ॐ कन्चन दानुं कुछ न मानूं ।
कापड़ दानूं कुछ न मानूं ।
चोपड़ दानुं कुछ न मानूं ।
पाट पटम्बर दानुं कुछ न मानूं ।
पांच लाख तुरगम दानूं कुछ न मानूं ।
हस्ती दानुं कुछ न मानूं ।
तिरिया दानुं कुछ न मानूं ।
मानूं एक सूचील सनानूं ॥
शब्द ॥ 105 ॥
ॐ आप अलेख उपन्ना शंभू ,निरह निरंजन धंधूकारुं ।
आपै आप हुआ अपरंपर , नै तद चन्दा नै तद सुरुं ।
पवण न पाणी धरती आकाश न थीयों ।
नां तद मास न वर्ष न घड़ी न पहरुं ,धूप न छाया ताव न सीयों ।
न त्रिलोक न तारा मण्डल , मैघ न माला वर्षा थीयों ।
न तद जोग नक्षत्र तिथि न बारसियो ,न तद चवदश पूनो मावसीयों ।
न तद समंद न सागर न गिरि न पर्वत , ना धौलगिरि मेर थीयों ।
न तद हाट न बाट न कोट न कस्बा ,बीणज न बाखर लाभ थीयों ।
यह छत धार बड़े सुल्तानों ,रावण राणों ।
ये दिवाणा हिन्दू मुस्लमानु ।
दोय पंथ नांही जूवा जूवा ।
ना तद काम न कर्षण जोग ,न दर्शन ,तीर्थ बासी ये मसबासी ।
ना तद होता जपिया तपिया , ना खच्चर हीबर बाज थीयों ।
ना तद शूर न बीर न खड़ग न क्षत्री ,रण संग्राम न झूझ थीयों ।
ना तद सिंह न स्वायज मृग पखेरुं ,हंस न मोरा लीलै सूवो ।
रंग न रसना कापड़ चोपड़ ,गोहुं चावल भोग न थीयों ।
माय न बाप न बहण न भाई ,ना तद होता पूत धीयों ।
सास न शब्दूं जीव न पिंडूं ,ना तद होता पुरुष त्रियों ।
पाप न पुण्य न सती न कुसती , ना तद होती मया न दया ।
आपै आप उपन्ना शंभू ,निरह निरजन धुंधुकारूं ।
आपो आप हुआ अपरंपर ,हे राजेन्द्र लेहूं विचारूं ॥
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