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शब्द ॥ 101 ॥
ॐ नितही मावस नित संकरांति, नितही नवग्रह बैसै पांति ।
नितही गंग हिलोरे जाय , सतगुरु चीन्हैं सह्जै नहाय ।
निरमल पाणी निरमल घाट ,निरमल धोबी मांडयो पाट ।
जे यो धोबी जाणै धोय ,तो घर में मैला वस्त्र रहै न कोय ।
एकमन एकचित साबण लावै , पहरंतो गाहक अति सुख पावै ।
ऊंचे नीचे करे पसारा ।
नांही दूजे का संचारा ।
तिल में तेल पहुप में वास , पांच तत्व में लियो प्रकाश ।
बिजली कै चमकै आवै जाय ।
सहज शून्य में रहै समाय ।
नै यो गावै न यो गवावै , स्वर्गे जाते बार न लाई ।
सतगुरु ऐसा तत्व बतावै , जुग जुग जीवै बहुर न आवै ॥
शब्द ॥ 102 ॥
ॐ विष्णु विष्णु भण अजर जरीजै ,धर्म हुवे पापां छुटीजै ।
हरि पर हरि को नाम जपीजै ,हरियाली हरि आण हरुं ।
हरि नारायण देव नरूं ।
आशा सास निराश भईलो ,
पाईलो मोक्ष द्वार खिणूं ॥
शब्द ॥ 103 ॥
ॐ देखा अदेख्या सुणा असुणा , क्षमारूप तप कीजै ।
थोड़े मांहि थोड़े रो दीजै ,होते नाहि नां कीजै ।
कृष्ण मया तिहुं लोका साक्षी, अमृत फूल फलीजै ।
जोय जोय नाम विष्णु के बीजै अन्नत गुणा लिख लीजै ॥
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