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साखी |7|

देवतणी परमोध में कस्मो समो न कोय।

सैंसो तो सारा सिरे अरू स्वर्गा में होय।

हाथ जोड़ सैंसो कहै मागे सीख जमात।

घर आये को दीजिए सुण सैंसा यों बात।

एक बात मोसो कहयो एक बात सौ बार।

मेरे घर को जगत गुरू जाणैं सब संसार।

आंजस कर सैंसे कही देव न आई दाय।

सतगुरू आप पधारिया पत्री लिवी उठाय।

आवाज करी हरि आंवता भोजन हो सोईलाव।

सतगुरू उभा आंगणें परखण आया भाव।

नारी सारी आंगणैं कीया बैठी ठाट।

भिक्षा न घलै भावसुं उभा जोवै बाट।

लहणावत ज्यूं क्यों खड़यो समझायौ सौ बार।

कह्‌यो ने माने सामियो है तो किसो विचार।

जर झाड़ ठमको दियो नारी कियो जोर।

भनाय चला घर आपणै पत्री केरी ठोर।

प्रभाते सैंसो आवीयो देवतणैं देवाण।

सुण सैंसा सतगुरू कह्‌यो ओ सहनाण पिछाण।

ओ पटंतरा सांभलो सैंसो गयो निधाय।

मुधे मुह सैंसो पड़यो सांभल सकै न कोय।

साथरिया कहे देव सुं म्हारी अर्ज सुणो सुरराय।

जेथे छोड़ो हाथ सुं जड़ामल से जाय ।

उठ सैंसा सतगुरू कहे गर्व न करो लिगार।

जिण हरजी ऐसे कही साच बड़ो संसार।

सैंसो तो सारा सिरे।



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