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साखी |6|
राग- रामगिरि
जागो मोमणों नां सोवो न करो नींद पियार।
जैसा सुपना रैण का ऐसो ओ संसार।
केई सुभागी आम्बो रोपियो भगवत के दरबार।
पींघ पड़ली आम्बे सोवनी हींडै के शुचियार।
एकणि डाली हूं चढ़ी दूजे मोमण बीर।
जिण तो डाले हूं चढी तिणी घणेरी भीड़।
हाथांरो मूंदडे गिर पडयो कानारी नवरंग बीड।
काज पराया न सरे जाहं दुख ताह पीड़।
एकण डाडे जुग गयो राजा रंक फकीर।
एक सिंहासन चढि चल्या एकड़ बंध्या जाय जंजीर।
दुर्लभ देशां गरजीयो बूठो घट घट मांहि।
बाहर थाते उबरिया भीगा मंदिर रै माहि।
छान पुराणी छज नवों चुय चुय पड़े मंजीठ।
लाखों इला पर चेतिया जायर बसिया बैकुण्ठ।
नाव दिरावो देवजी जांसै उतरां पार।
उदोजन बोले बीणती म्हारी आवागण निवार।
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