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साखी |3|
जीवनै॥ टैर॥
विष्णु विसार न जाय रे प्राणी, तिह सिर मोटो दावो।
दिन-दिन आव घंटती जावे लगन लिख्यो ज्यूं सावो।
काला रूंह कलेवर उठा आयो (छै) बुग बधाओं।
पालटियो गढ़ काय न चेत्यो, घाती रोल भनावो।
ज्यों ज्यों लाज दूनी की लाजै, त्यों त्यों दाब्यो दावो।
भलो हुवै सो करे भलाई,बुरियो बुरी कमावै।
दिन को भूल्यो रात न चेत्यो, दूर गयो पछितावैं।
गुरूमुख मूर्खो चढो न पोहण, मन मुख भार उठावै।
धन को गरब न कर रे मूर्खा,मत धणियां ने भावै।
हुकम धणी को पान भी डूबे सिला तिर ऊपर आवैं।
षिण ही मासो षिण ही तोले, षिण वाइंदो वावै।
षिण ही जाय निरंतर बरसे, षिण ही आप लखावैं।
षिण ही राज दियो दुर्योधन , लेता वार न लावै।
षिण ही मेघ मंडल होय बरसै, षिण चोबायो बावै।
सोवन नगरी लक सरीखी, समंद सरीखी खाई।
महारावण सा बेठा जिहि के, कुभकरण सा भाई।
जर जंवराणां सांकल बांध्या, कूवे मौत संजोई।
जिण रे पवन बुहारी देतो, सूरज तपे रसोई।
वासंदर ज्वारा कपडा धोवे, कोटु दल वहाई |
नवग्रह रावण पाये बंधया, फेरी आपण राई |
तिन हूँ विसनजी री खबर न पाई, जाते वार न लगाई |
जिन रे पट मंदोदरी रानी, साथ न चाली साई |
गुरू प्रसादे हुयो पोह बीदो, मानी विसन दुहाई।
चांद भी शरणै सूर भी शरणै, शरणै मेर सवाई।
धरती अरु असमान भी शरानै, पवन भी शरणं वाई ।
सुर आकाश शेष पन्याले, सतगुरु कहे तो आवै ।
भगवीं टोपी थल सिर आयो, करियो जो फुरमावै।
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